सुख ईश्वर की दया है, तो दुख उनकी कृपा
भगवान की दया सुखों और दुखों के बीच देखी जा सकती है, इन दोनों का समन्वय उचित ही हुआ है. सुख दुख के दो पहियों पर ही जीवनरूपी रथ ठीक तरह से चल सकता है. दोनों की सुविधा देकर भगवान ने हमारे ऊपर दया और कृपा की दुहरी अनुकंपा की है.
सुख इसलिए है कि उसके सहारे हमें हंसने, प्रमुदित होने का अवसर मिले और वैसे ही अवसर अधिक उपार्जित करने के लिए, अधिक प्रयास करने की प्रेरणा मिले. सत्कर्मों के सत्परिणाम पर हमारा विश्वास सुदृढ़ होता चला जाये.
दुख इसलिए है कि हमें कठिनाइयों से जूझने का और उन्हें नगण्य समझने का अभ्यास बढ़े, कठिनाईयों से रहित किसी का भी जीवन नहीं हो सकता. उनसे लड़ना उतना कठिन नहीं है बल्कि सच तो यह है कि जटिल परिस्थितियों से निपटने में मनुष्य के साहस, आत्मविश्वास, पौरुष, धैर्य जैसे अनेक सद्गुणों को विकसित करने का लाभ मिल जाता है और मनुष्य इतना पराक्रमी बन जाता है कि आगे चलकर बड़े काम कर सके.
माता बच्चे को अनिच्छापूर्वक डॉक्टर के पास तब ले जाती है, जब उसके फोड़े का बढ़ता हुआ मवाद सारे हाथ को सड़ाता हुआ दिखता है. ऑपरेशन के समय थोड़ा कष्ट तो जरूर होगा, पर बच्चा सारे शरीर को विषैला कर देनेवाली विभीषिका से बच सकता है, इसी हित कामना से ही छाती पर पत्थर रखकर वह अस्पताल ले जाती है. वहीँ डॉक्टर को भी बच्चे से कोई द्वेष नहीं, वरन वह शुभचिंतक की भावना से बच्चे के रोने चिल्लाने पर भी उसका ऑपरेशन करता है.
न्यायाधीश किसी को सजा देता है, तो उसमे लोकहित की भावना काम करती है. सर्व साधारण की अनीति का परिणाम देख भय करने का अवसर मिलता है. साथ ही अपराधी को उस पाप से मुक्ति मिल जाती है, अन्यथा वह भीतर ही भीतर घुमड़ता रहता है, तो सारी स्वस्थ मनोवृत्तियों का नाश कर देता है. जीवन की सरसता उभयपक्षीय अनुभवों में है. मिठाई के साथ नमकीन भी रहे तो भोजन का मजा आए. दिन ही नहीं, रात भी आवश्यक है. बरसात ही नहीं, गर्मी भी चाहिए. धूप- छांव वाला मौसम ही तो सुख देता है. सुख हमें हताश नहीं होने देता और दुख अहंकार भरी मन की ईच्छा पर नियंत्रण करता रहता है. सुख के प्रलोभन से मनुष्य सत्कर्म करता है और दुख के आतंक से कुकर्म करने से बचता है. इसलिये दुख सुख की कृपा और दया की खट्टी- मीठी चटनी हमें रुचि पूर्वक चाटनी चाहिए.
श्रोत : अखंड ज्योति
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